जल्द ही खात्मे की ओर लाल आतंक? — बस्तर में सुरक्षा कार्रवाई तेज, नक्सलियों में दरारें बढ़ीं

जल्द ही खात्मे की ओर लाल आतंक? — बस्तर में सुरक्षा कार्रवाई तेज, नक्सलियों में दरारें बढ़ीं

छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या और माओवादियों से शांति वार्ता की टाइमलाइन

छत्तीसगढ़ में बीते तीन दशक से ज्यादा समय से नक्सलवाद की समस्या है. इतने सालों में माओवाद समस्या को लेकर छत्तीसगढ़ का बस्तर छलनी होता रहा है. छत्तीसगढ़ पुलिस, सीएएफ, डीआरजी, एसटीएफ और पैराममिलिट्री फोर्स की कई टुकड़ियां यहां एंटी नक्सल ऑपरेशन में जुटी हुई है. राज्य गठन के बाद यहां प्रमुख दल कांग्रेस और बीजेपी की सरकारें रहीं. दोनों दलों की सरकारों में नक्सल समस्या को लेकर एक व्यापक रणनीति बनाई गई और उस पर काम हुआ. बस्तर के 7 जिलों समेत छत्तीसगढ़ के अन्य नक्सल प्रभावित जिलों में माओवादियों के खिलाफ फोर्स का ऑपरेशन जारी रहा. इस बीच कई सरकारों में नक्सल समस्या के खात्मे को लेकर शांति वार्ता की कोशिशें होती रही पर इसमें कोई सफलता हासिल नहीं हो सकी.

छत्तीसगढ़ नक्सल पीस टॉक की टाइमलाइन: छत्तीसगढ़ में माओवादियों और सरकार के साथ शांति पहल की समयरेखा पर नजर डालें तो इसकी कोशिश साल 2009 से शुरू हुई है. उस वक्त प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी और डॉक्टर रमन सिंह राज्य के मुख्यमंत्री थे.

छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में इस वर्ष सुरक्षा बलों की तेज और गोपनीय कार्रवाइयों के बीच नक्सल संगठन—CPI (माओवादी)—पर लगातार दबाव बढ़ा है। जंगलों में हालिया मुठभेड़ों, बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण और कुछ शीर्ष नेताओं के खात्मे से यह बार-बार सवाल उठ रहा है कि क्या लाल आतंक का अंत अब नजदीक है।

क्या हो रहा है मैदान में?

पिछले कुछ महीनों में बस्तर के Bijapur, Narayanpur, Dantewada और आसपास के इलाकों में कई बड़े ऑपरेशन और मुठभेड़े रिपोर्ट हुए हैं — इनमें सुरक्षा बलों ने हथियार-गोला बारूद बरामद किए और कुछ माओवादी नेताओं के ढेर होने/निष्प्रभावी होने के भी मामले सामने आए हैं। इसी दौरान Narayanpur में दर्जनों नक्सलियों का आत्मसमर्पण भी हुआ है — इनमें कई ऐसे नाम शामिल हैं जिन पर इनामी रकम लगी थी।

सरकारी दावा

सरकारी और सुरक्षा सूत्रों का कहना है कि 2025 में बस्तर रेंज में दर्जन-दर्जन सफल ऑपरेशन हुए हैं और साजो-सामान व नेताओं के नुकसान के कारण माओवादी संगठन कमजोर हुआ है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी उल्लेख है कि पिछले 12–18 महीनों में बस्तर में सैकड़ों कमांडर/सदस्य निष्क्रिय हुए या सरेंडर कर चुके हैं — यही है कि नक्सल समूहों ने केन्द्र को शांति-प्रस्ताव भी भेजने की कोशिशें की हैं।

स्थानीय असर: सड़कों से विकास तक

सुरक्षा-कार्रवाइयों के साथ-साथ राज्य सरकार विकास योजनाओं, सड़कों और संचार के विस्तार का जिक्र कर रही है — ताकि आदिवासी क्षेत्रों में सरकार की उपस्थिति बढ़े और नक्सलियों को सामाजिक-आर्थिक सिरे से काटा जा सके। भूमि-अधिकार, रोजगार और सार्वजनिक सेवाओं में तेजी न हो तो अस्थायी सैन्य सफलता दीर्घकालिक शांति में तब्दील नहीं होगी, ऐसा कई विशेषज्ञ व स्थानीय कार्यकर्ता कहते हैं।

विपक्षी आवाजें और मानवाधिकार चिंताएँ

नक्सलवादी हिंसा पर कड़ा प्रहार जरूरी माना जा रहा है, पर साथ ही कुछ मानवाधिकार समूहों ने हिंसक अभियानों के दौरान नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभावों और ‘कठोर’ तफ्तीश-कार्रवाइयों की भी आलोचना की है। कहा जाता है कि केवल सैन्य दमन से समस्या जड़ से नहीं हटती — सामाजिक न्याय और जमीन-सम्बन्धी शिकायतों का समाधान भी जरूरी है।

विशेषज्ञों का कहना

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान रफ्तार रखी गई तो माओवादी संगठन की सक्रियता कम होना संभव है, मगर 100% नक्सलमुक्ति केवल फोर्स से नहीं — राजनीतिक और विकासात्मक रणनीति से मिले जुले प्रयास से ही हासिल होगी।

दूसरी ओर कुछ सुरक्षा विश्लेषक यह भी कहते हैं कि माओवादी अब और अधिक साजिशी, विस्थापित और संचालन-रहित हो सकते हैं — इसलिए सतत़ निगरानी और लोक-सहभागिता ज़रूरी है।

नतीजा — क्या जल्द ही खात्मा संभव है?

मौजूदा घटनाक्रम — बढ़ी हुई तैनाती, सफल ऑपरेशन और बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण — आशावादी संकेत देते हैं। परंतु स्थायी नक्सलमुक्ति के लिए ज़मीन पर विकास, स्थानीय जनता का भरोसा, और लंबी अवधि की नीतियाँ अनिवार्य हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि “खात्मे की दिशा में कदम तेज़ हुए हैं, पर अंतिम जीत तब ही संभव होगी जब हिंसा के साथ-साथ विकास और संवेदनशील राजनीतिक संवाद भी बराबर तेज़ हो।”

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