बस्तर में बदलाव की बड़ी कहानी — नक्सलगढ़ में विकास की गूंज, बस्तर ओलंपिक बना टर्निंग पॉइंट

बस्तर में बदलाव की बड़ी कहानी — नक्सलगढ़ में विकास की गूंज, बस्तर ओलंपिक बना टर्निंग पॉइंट

रायपुर/बस्तर। कभी नक्सलगढ़ के नाम से चर्चित रहे बस्तर डिवीजन में अब बदलाव की बयार तेज़ दिखाई दे रही है। केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के पूर्ण सफाये का टास्क तय किया है। इस लक्ष्य को लेकर सुरक्षा एजेंसियां अभियान मोड में हैं, लेकिन सबसे बड़ा फर्क मैदान पर हो रहे विकास कार्यों से दिख रहा है। इसी क्रम में बस्तर ओलंपिक 2025 ने जनमानस में एक नया विश्वास भर दिया है।


नक्सल गांव अब विकास का गवाह

25 अक्टूबर 2025 का दिन बस्तर के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ। जिस अबूझमाड़ के कच्चापाल गांव में पहुंचना भी कठिन माना जाता था, वहां छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री विजय शर्मा मोटरसाइकिल से पहुंचे और वहीं से बस्तर ओलंपिक 2025 का शुभारंभ किया। साथ में पुलिस विभाग के बड़े अधिकारी भी मौजूद थे। महिलाओं सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणों की भागीदारी ने तस्वीर बदलने का संदेश दिया।


रस्साकशी से खींची विकास की रेखा

इस बार कच्चापाल में कोई नक्सली बनाम संविधान नहीं, बल्कि ओलंपिक खेलों की रस्साकशी चर्चा में रही। खेलों के जरिए सरकार ने संकेत दिया कि अब संघर्ष की नहीं, विकास की लाइन खिंच रही है। बस्तर ओलंपिक में महिलाओं की बड़ी भागीदारी इस बदलाव का मजबूत सबूत है।


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कच्चापाल से पक्के अधिकार का ऐलान

गांव पहुंचकर उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने घोषणा की कि इलाके में काबिज लोगों को पक्की जमीन के दस्तावेज दिए जाएंगे। 6 नवंबर को कच्चापाल में विशेष शिविर लगाकर जमीन के कागज सौंपे जाएंगे। यह पहल पूरे माड़ क्षेत्र में आगे बढ़ाई जाएगी।


नक्सलवाद नेम मिटाने की तैयारी — लक्ष्य 31 मार्च 2026

उपमुख्यमंत्री लगातार नक्सल प्रभावित इलाकों का मोटरसाइकिल पर दौरा कर रहे हैं। 24 अक्टूबर को वे बीजापुर के नंबी चौकी तक बाइक से पहुंचे और वहां 20 लाख के सामुदायिक भवन व 95 लाख की पर्यटन सड़क बनाने की घोषणा की। उन्होंने स्पष्ट कहा – “नक्सलवाद का अंत करीब है, विकास अब दूर नहीं।”


बदलाव की परिभाषा बदल रहा बस्तर

सरकार का फोकस साफ है —

नक्सलवाद का सफाया

आधारभूत संरचना मजबूत करना

पर्यटन, खेल और जमीन अधिकार से विश्वास कायम करना

उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा का नक्सल अंचल में बाइक से जाना खुद इस बात का प्रतीक बन गया है कि अब डर नहीं, विकास का दौर शुरू हो गया है। अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि 31 मार्च 2026 से पहले बदलते बस्तर में विकासवाद की जीत कितनी निर्णायक साबित होती है।


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