
बारिश तो थम गई, मगर अंबिकापुर की सड़कों का ग़म अब भी जारी है…जहां पानी सूख गया, वहां धूल ने डेरा डाल लिया — और जनता अब भी गड्ढों के साये में जी रही है।
पांच फोरलेन सड़कों के कायाकल्प का सपना अब भी फ़ाइलों में कैद है।लोक निर्माण विभाग ने प्रस्ताव भेजे, मगर हुकूमत के दस्तख़त अब तक गुम हैं। स्वीकृति की राह लंबी है, टेंडर की मंज़िल दूर — और जनता के पैरों तले ज़मीन उबड़-खाबड़।
वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं —
“इन सड़कों की हालत अब सिर्फ खराब नहीं, शर्मनाक है।”कभी पानी में डूबे, अब धूल में लिपटे रास्तों ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है।गड्ढों ने सवारी की जगह सफ़र को सज़ा बना दिया है।
इधर कांग्रेस ने भी सुर बदले हैं, तंज़ में लफ़्ज़ों की धार है।पूर्व जिला अध्यक्ष राकेश गुप्ता का कहना है —
“ये फैसला तो बस वाहवाही की किताब का एक पन्ना था। काम की शुरुआत बारिश से पहले हो जानी चाहिए थी,मगर प्रशासन खुद अपनी सैलरी के इंतज़ार में है।”
कहने को मौसम बदला, मगर हालात वही पुराने हैं…
अंबिकापुर की सड़कें अब भी पूछती हैं —दर्द का सफ़र कब खत्म होगा?

