सत्ता के साए में चल रहा नया खेल:वसूली का निज सचिव

सत्ता के साए में चल रहा नया खेल:वसूली का निज सचिव

छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और सियासत के गलियारों में इन दिनों एक नया रुझान (trend) तेज़ी से उभर कर सामने आया है। सरकारी खरीदी और टेंडर की मॉनिटरिंग अब सीधे मंत्रियों के बंगले से हो रही है। सीएम सचिवालय ने सचिवों और विभागाध्यक्षों (HODs) को सख़्त तनबीह (चेतावनी) जारी कर दी है, मगर हक़ीक़त यह है कि जब तक मंत्रियों के निज सचिवों पर लगाम नहीं लगाई जाएगी, तब तक इसका कोई बड़ा असर होता दिखाई नहीं दे रहा।

सूत्रों के मुताबिक़, लगभग दस में से आठ मंत्री ऐसे हैं जिनके निज सचिव ही डील से लेकर डिलीवरी तक का पूरा इंतज़ाम संभाल रहे हैं। बंगले से ही सौदे तय होते हैं और सप्लायरों से रकम का हिसाब-किताब वहीं बैठकर किया जाता है।

कहा जा रहा है कि दो-एक मंत्री तो अपने ही निज सचिवों के जाल में ऐसे फंसे कि बरसों में बनी उनकी साफ-सुथरी छवि धूमिल हो गई। इन ख़टराल निज सचिवों ने सत्ता के रसूख का ऐसा स्वाद चखा लिया है कि अब उन्हें इमांदारी फीकी लगने लगी है।

हालात यह हैं कि सरकारी ठेकेदारी में जो हिस्सा पहले सचिवों तक सीमित था, अब उसका कंट्रोल सेंटर मंत्रियों के बंगले बन गए हैं। सरकारी तिजोरी की “लक्ष्मी” जब इस तरह बांटी जाने लगे तो जाहिर है कि कानून और नीयत, दोनों पर सवाल उठना लाज़मी है।

सबसे अफ़सोसनाक बात तो यह है कि हाल ही में पूर्व प्रधानमंत्री जैसी प्रातःस्मरणीय शख़्सियत की प्रतिमा निर्माण के लिए कमीशन माँगे जाने की खबरें भी सामने आईं। अब भला सोचिए, जब श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक काम भी मुनाफ़े का ज़रिया बन जाए तो फिर इस सियासत में पवित्रता बचती ही कहाँ है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सरकार ने वाकई अपनी साख और मंत्रियों की छवि बचानी है तो उसे सबसे पहले इन निज सचिवों की मनमानी पर लगाम कसनी होगी — वरना यह वसूली का निज सचिव राज कई चेहरों की चमक मिटा देगा।

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