जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर, बम घरों पर गिरें कि सरहद पर रूह-ए- तामीर जख्म खाती है
ख़ून अपना हो या पराया होनस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िरजंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब मेंअम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िरबम घरों पर गिरें कि सरहद पररूह-ए-तामीर ज़ख़्म खाती हैखेत अपने जलें कि औरों केज़ीस्त फ़ाक़ों…










