ताबूत में सुलाना ताकि मैं उसमें बड़ा होता रहूं – ग़ाज़ा के बच्चों के लिए यह क विता एक बार फिर…. यह कविता हमारी साथी कविता कृष्णापल्लवी ने लिखा है !
ताबूत में सुलाना ताकि मैं उसमें बड़ा होता रहूं - बाबा! मैं दौड़ नहीं पा रहा हूँ।ख़ून सनी मिट्टी से लथपथमेरे जूते बहुत भारी हो गये हैं।मेरी आँखें अंधी होती जा रही हैंआसमान से बरसती…










