छत्तीसगढ़ के 575 करोड़ रुपए के बहुचर्चित डीएमएफ (जिला खनिज न्यास) घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने जांच की रफ्तार तेज कर दी है। करोड़ों रुपये के फंड के दुरुपयोग से जुड़े अहम दस्तावेज ईडी के हाथ लगे हैं। इनमें ऐसे कई भुगतान और स्वीकृति के रिकॉर्ड शामिल हैं जिन्हें जिला स्तर पर पूर्व कलेक्टरों की मंजूरी से जारी किया गया था। यही वजह है कि अब पूर्व कलेक्टरों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है।
ईडी सूत्रों के अनुसार, डीएमएफ फंड से बिना टेंडर के कामों का आवंटन, तय दर से ज्यादा कीमत पर सामग्री की आपूर्ति, अधूरे कार्यों के बावजूद भुगतान और फर्जी बिलों के जरिए रकम निकालने जैसी गंभीर अनियमितताओं के प्रमाण मिले हैं। चूंकि डीएमएफ फंड की निगरानी जिला कलेक्टरों के अधीन होती है, इसलिए अब उनकी जवाबदेही तय होने की संभावना बढ़ गई है।
🔹 सप्लायरों और अफसरों की मिलीभगत
ईडी की जांच का सबसे ज्यादा असर उन सप्लायरों पर पड़ा है, जिन्होंने कथित तौर पर अपात्र ठेके हासिल किए या बिना काम किए भुगतान उठाया। एजेंसी ने कई सप्लायरों को समन जारी कर पूछताछ शुरू कर दी है। मोबाइल चैट, बैंक ट्रांजैक्शन और ईमेल रिकॉर्ड के आधार पर अफसर-सप्लायर गठजोड़ की परतें खुल रही हैं।
सूत्रों के अनुसार, करीब 12 से अधिक सप्लायरों की भूमिका संदिग्ध है। ईडी को उनके जिला अधिकारियों से मिलीभगत के पुख्ता सबूत मिले हैं। माना जा रहा है कि इस घोटाले में राजनीतिक और प्रशासनिक गठजोड़ की भी अहम भूमिका रही है। आने वाले दिनों में कुछ बड़े नामों पर शिकंजा कसने की पूरी संभावना है।
🔹 ये हैं घोटाले के प्रमुख आरोपी
इस मामले में अब तक ईडी ने कई बड़े नामों पर कार्रवाई की है —
- निलंबित IAS रानू साहू
- माया वारियर (पूर्व सहायक आयुक्त, आदिवासी विभाग)
- सूर्यकांत तिवारी (व्यवसायी)
- सौम्या चौरसिया (पूर्व उपसचिव)
- मनोज द्विवेदी, भरोसा राम ठाकुर (पूर्व नोडल अधिकारी, कोरबा DMF)
- भुनेश्वर सिंह राज, राधेश्याम मिर्झा, वीरेंद्र कुमार राठौर
वहीं संजय शेंडे, ऋषभ सोनी और राकेश कुमार शुक्ला अभी तक गिरफ्त से बाहर हैं।
ईडी की कार्रवाई आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है, क्योंकि जांच एजेंसी ने कई जिलों से अतिरिक्त दस्तावेज तलब किए हैं और पूर्व कलेक्टरों से पूछताछ की तैयारी शुरू कर दी है।

