1970 के दशक में जब देवानंद अपनी फ़िल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ बना रहे थे, तब हिंदी फ़िल्मों की कोई भी टॉप हीरोइन उनकी बहन का किरदार निभाने के लिए तैयार नहीं थी। वजह साफ़ थी — सभी अभिनेत्री देवानंद के साथ रोमांटिक लीड में दिखना चाहती थीं, जबकि इस फ़िल्म में बहन का किरदार मुख्य था और अभिनय की असली चुनौती उसी में थी।
देवानंद एक ऐसी लड़की की तलाश में थे जो भारतीय दिखती हो लेकिन जिसका व्यक्तित्व और परवरिश आधुनिक और पश्चिमी हो। तभी उनके दोस्त अमरजीत की एक पार्टी में उनकी मुलाकात हुई ज़ीनत अमान से — हाल ही में मिस एशिया पैसिफिक का ताज जीतकर लौटीं, मॉडर्न और बेबाक अंदाज़ वाली ज़ीनत बिल्कुल वैसी ही थीं जैसी देवानंद अपनी फ़िल्म के किरदार में ढूंढ रहे थे।
देवानंद अपनी आत्मकथा Romancing With Life में पहली मुलाकात को याद करते हुए लिखते हैं—
“ज़ीनत आत्मविश्वास से भरी हुई थीं। उन्होंने बेझिझक मेरे सामने सिगरेट जलाई और मुस्कुराते हुए मुझे भी पेश कर दी। उसी क्षण मुझे लगा कि यही मेरी ‘जस्बीर’ है।”
अगले ही दिन उनका स्क्रीन टेस्ट हुआ और वहीं फैसला हो गया — ज़ीनत ही रोल के लिए परफेक्ट हैं।
फ़िल्म की शूटिंग नेपाल में हुई और जब तक सुपरहिट गीत ‘दम मारो दम’ शूट हुआ, ज़ीनत पर्दे पर एक सहज, सधी और दमदार अभिनेत्री बन चुकी थीं।
‘दम मारो दम गर्ल’ से सुपरस्टार तक का सफ़र
‘हरे रामा हरे कृष्णा’ रिलीज़ होते ही ज़ीनत अमान रातों-रात एक नई आइकॉन बन गईं। वह भारत की युवाओं की नई पहचान — मॉडर्न, बिंदास और ब्यूटीफ़ुल — बनकर उभरीं।
हालांकि एक चुनौती अभी बाकी थी — उन्हें सिर्फ “बहन वाले किरदार” की इमेज से बाहर निकालना। इसके लिए देवानंद ने उनके साथ आगे ‘हीरा पन्ना’ बनाई, जिसमें ज़ीनत एक ग्लैमरस मॉडल और अंतरराष्ट्रीय फ़ोटोग्राफ़र के रूप में दिखीं।
राज कपूर की ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ और नई ऊंचाइयां
ज़ीनत अमान का करियर नया मोड़ तब आया जब उन्होंने खुद राज कपूर को दिखाया कि वही उनकी हिरोइन बन सकती हैं। पारंपरिक घाघरा-चोली में, गजरे लगाए वह अचानक राज कपूर के होटल पहुंचीं और कहा —
“सर, मैं आपकी रूपा हूं।”
स्क्रीन टेस्ट पास हुआ और उनकी ज़िंदगी की सबसे मजबूत भूमिकाओं में से एक उन्हें मिल गई।
फ़िल्म की शूटिंग के दौरान राज कपूर का समर्पण भी जगजाहिर रहा — फ़ार्महाउस की दीवारों से लेकर शूट लोकेशन तक, ज़ीनत के विशाल पोस्टर लगाए जाते थे। शूट के दौरान चाहे उन्हें लगातार पानी में भीगना पड़े, पर हर शॉट पर परफेक्शन ज़रूरी था।
अंतरराष्ट्रीय पहचान से ‘डॉन’ तक
इसी दौर में उन्हें विदेशी फ़िल्म ‘शालीमार’ में भी मौका मिला, जिसमें वह धर्मेंद्र और हॉलीवुड स्टार रैक्स हैरिसन के साथ नज़र आईं। इस बीच अमिताभ बच्चन के साथ उनकी फ़िल्म ‘डॉन’ ने बॉक्स ऑफिस पर धमाका किया और वह बॉलीवुड की सबसे ग्लैमरस और ऊंची फीस लेने वाली अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं।
निष्कर्ष
देवानंद की नज़र, एक मौका और ज़ीनत अमान का बेमिसाल आत्मविश्वास — यही वह कॉम्बिनेशन था जिसने हिंदी सिनेमा को एक नई और आधुनिक नायिका दी।
‘दम मारो दम’ की धुन से लेकर ‘रोपा’, ‘डॉन’ और ‘शालीमार’ तक — ज़ीनत अमान सिर्फ स्टार नहीं बनीं, वे एक ट्रेंड-सेटर बन गईं।

