इमरान खान की कलम से….
हमारे देश में धर्म, जाति, भाषा और विचारधारा को लेकर असंख्य मतभेद हो सकते हैं, लेकिन एक चीज है जो इन सारी दीवारों को चुपचाप तोड़ देती है—वह है पैसा। पैसा किसी से यह नहीं पूछता कि वह मंदिर में पूजा करता है या मस्जिद में नमाज़, गुरुद्वारे में माथा टेकता है या गिरजाघर में प्रार्थना। इसकी एक ही भाषा है—लेन-देन की, और इसका एक ही धर्म है—ज़रूरत।
किसी भी बाज़ार में जाइए, वहां दुकानदार को ग्राहक की आस्था से मतलब नहीं होता, उसे सिर्फ़ नोट या डिजिटल भुगतान की पिंग की आवाज़ चाहिए। यह अमीर और गरीब, पढ़ा-लिखा और अनपढ़, गांव और शहर—सबमें समान रूप से चलता है। अमीर के पास पैसा होता है, तो उसकी आवाज़ बुलंद होती है; गरीब के पास पैसा नहीं होता, तो उसका संघर्ष बढ़ जाता है।
मंदिर में चढ़ाया गया चढ़ावा, मस्जिद में दी गई ज़कात, गुरुद्वारे का लंगर, गिरजाघर का दान—सबकी रफ़्तार पैसे से ही चलती है। धर्म की इमारतें आस्था पर खड़ी होती हैं, लेकिन उनके संचालन में भी नोटों और सिक्कों की खनक छुपी होती है।
पैसे की यही खासियत है कि यह किसी धर्म या मज़हब का नहीं होता, बल्कि सभी का होता है। यही वजह है कि यह सबसे बड़ा “सेक्युलर” तत्व बन जाता है—जहां हर हाथ में इसकी चाह है और हर जेब में इसकी कमी या मौजूदगी कहानी कहती है।
आख़िर में, यह सच है कि इंसान धर्म, भाषा और जाति में बंट सकता है, लेकिन जब जेब में पैसा होता है तो वह हर जगह स्वागतयोग्य हो जाता है। शायद यही कारण है कि कहते हैं—पैसा भगवान नहीं है, लेकिन भगवान से मिलने का रास्ता ज़रूर आसान कर देता है।

