छत्तीसगढ़ में युवाओं के बीच बढ़ती नशे की लत एक गंभीर सामाजिक चिंता का विषय बन चुकी है। रायपुर से लेकर छोटे शहरों और गांवों तक, अवैध मादक पदार्थों की उपलब्धता इतनी आसान हो गई है कि युवा वर्ग तेजी से इसकी गिरफ्त में आता जा रहा है।
विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि नशे की ओर बढ़ने का एक बड़ा कारण अभिभावकों की लापरवाही भी है। कारोबारी या नौकरीपेशा अभिभावक अक्सर अपने बच्चों की दिनचर्या, संगत और मानसिक स्थिति पर ध्यान नहीं दे पाते। परिणामस्वरूप किशोर और युवा गलत संगत में पड़कर नशे की आदतों को अपना लेते हैं।
शुरुआती दौर में यह लत मामूली प्रतीत होती है, लेकिन समय के साथ नशे की आदत युवाओं के शरीर और मन दोनों को अपने शिकंजे में कस लेती है। ऐसी स्थिति में वे पैसे के लिए माता-पिता पर दबाव बनाने लगते हैं। पैसे नहीं मिलने पर घरेलू झगड़े, चोरी जैसी घटनाएं और अपराध की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है।
अक्सर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, जब अभिभावक स्थिति की गंभीरता को समझ पाते हैं। सामाजिक बदनामी के डर से वे अपने बच्चे को किसी पुनर्वास केंद्र या परामर्श सेवा में भेजने से भी हिचकिचाते हैं, जिससे हालात और बिगड़ जाते हैं।
इस बढ़ती समस्या पर रोक लगाने के लिए अब पुलिस विभाग और प्रशासनिक तंत्र को सजग और सक्रिय भूमिका निभानी होगी। केवल अभियान और नारों से बात नहीं बनेगी, बल्कि मादक पदार्थों के नेटवर्क को जड़ से खत्म करने के लिए कड़ी कार्रवाई और निगरानी की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार देश की युवा शक्ति को सही दिशा में लगाकर विकास का सपना देख रही है, तो उसे पहले इस नशे के दलदल से बाहर निकालना होगा। साथ ही, अभिभावकों को भी अपने बच्चों के साथ संवाद बढ़ाकर, समय देकर और समझदारी से मार्गदर्शन कर उनकी रक्षा करनी होगी।

