मैं हूं बीजापुर का बाघ… बताइए, भाग्यशाली हूं या दुर्भाग्यशाली?

मैं हूं बीजापुर का बाघ… बताइए, भाग्यशाली हूं या दुर्भाग्यशाली?

मैं बीजापुर के घने जंगलों का एक युवा बाघ हूं। कभी खुले आसमान के नीचे आज़ादी से घूमता था। जंगल मेरी दुनिया थी, शिकार मेरा स्वभाव और स्वतंत्रता मेरी पहचान।

लेकिन मार्च 2025 में मेरी जिंदगी बदल गई। शिकारियों के बिछाए लोहे के फंदे में मेरे दोनों पिछले पैर बुरी तरह फंस गए। घाव गहराते गए, दर्द बढ़ता गया और जीने की उम्मीद कम होती गई। तभी एक दिन खुद को बचाने की कोशिश में मैंने एक शिकारी पर हमला कर दिया। इसके बाद वन विभाग ने मुझे बचाया और रायपुर केजंगल सफारी ले आए ।

लंबा इलाज चला, सर्जरी हुई, दवाइयां मिलीं और धीरे-धीरे मैं फिर खड़ा होने लगा। नवंबर तक डॉक्टरों ने मुझे लगभग पूरी तरह स्वस्थ घोषित कर दिया। उन्होंने कहा कि मैं चल सकता हूं, दौड़ सकता हूं, शिकार करने की क्षमता भी वापस पा सकता हूं। उस दिन मुझे लगा कि अब मैं फिर अपने जंगल लौटूंगा।

मैं हर आहट पर उम्मीद करता था कि शायद आज मुझे आज़ाद करने का आदेश आएगा। लेकिन दिन महीनों में बदल गए। फाइलें चलती रहीं, पत्र लिखे जाते रहे, समितियां बनती रहीं, लेकिन मेरा जंगल मुझसे दूर ही रहा।

उधर, जिन जंगलों में मैं कभी विचरता था, वहां एक-एक कर कई बाघ शिकारियों का शिकार हो गए। खबरें सुनकर मन कांप उठता था। कभी सोचता हूं, अगर मैं वहीं होता तो शायद आज जीवित भी नहीं होता। फिर लगता है कि शायद यह कैद ही मेरी जिंदगी बचा रही है।

लेकिन दूसरी तरफ, एक बाघ के लिए जंगल ही उसका घर होता है। पेड़ों की खुशबू, मिट्टी की नमी, शिकार का रोमांच और स्वतंत्रता की अनुभूति—इन सबके बिना जीवन अधूरा है। मैं जिंदा हूं, सुरक्षित हूं, लेकिन अपने घर से दूर हूं।

आज अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस की पूर्व संध्या पर मैं सिर्फ एक सवाल पूछना चाहता हूं—

क्या मैं भाग्यशाली हूं कि शिकारियों के हाथों मरने से बच गया?
या दुर्भाग्यशाली हूं कि स्वस्थ होने के बाद भी अपने जंगल वापस नहीं लौट पाया?

इस सवाल का जवाब शायद मेरे पास नहीं है। लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि हर बाघ को सिर्फ बचाना ही नहीं, उसे उसका जंगल और उसकी आज़ादी भी लौटाना उतना ही जरूरी है।

क्योंकि बाघ की असली पहचान किसी बाड़े या पिंजरे में नहीं, बल्कि जंगल की खुली हवा में होती है।

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