रायपुर। उपराष्ट्रपति चुनाव 2025 में कांग्रेस प्रत्याशी बी सुदर्शन रेड्डी का नाम सामने आने के बाद बस्तर का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। सत्ता पक्ष जहां रेड्डी पर नक्सलवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहा है, वहीं अब बस्तर के एक नक्सल हिंसा पीड़ित का पत्र चर्चा में है।
कांकेर जिले के चारगांव निवासी 56 वर्षीय दिव्यांग किसान सियाराम रामटेके ने विपक्षी सांसदों को संबोधित करते हुए एक पत्र लिखा है। यह पत्र 25 अगस्त 2025 की तारीख में लिखा गया है और इसमें रामटेके ने अपने दर्द और पीड़ा को सामने रखा है।
रामटेके ने लिखा – “मैं किसान हूं लेकिन बस्तर में किसान होने की सजा अपनी जान देकर या दिव्यांग बनकर चुकानी पड़ती है। नक्सली हिंसा ने हमारे जीवन को तबाह कर दिया है।”
उन्होंने अपने साथ हुई नक्सली घटना का उल्लेख करते हुए लिखा कि एक दिन खेत में काम करते समय नक्सलियों ने उन पर हमला किया। “पहले मेरे पांव में गोली मारी, फिर पेट में गोलियां दागी और मरा समझकर मेरे ऊपर पत्थर पटक दिए। आज भी मैं दिव्यांग का जीवन जी रहा हूं।”
पत्र में सलवा जुडूम आंदोलन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अगर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने सलवा जुडूम पर प्रतिबंध नहीं लगाया होता तो बस्तर से नक्सलवाद बहुत पहले खत्म हो गया होता। उन्होंने आरोप लगाया कि सलवा जुडूम बंद होने के बाद नक्सलियों ने आंदोलन से जुड़े ग्रामीणों को चुन-चुनकर मार डाला या अपाहिज बना दिया।
सियाराम रामटेके ने बी सुदर्शन रेड्डी का नाम लिए बिना साफ लिखा – “सांसद जी, पता लगा है कि सलवा जुडूम को बंद कराने का आदेश देने वाले व्यक्ति को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया है। बस्तर का एक किसान होने के नाते मैं आपसे अपील करता हूं कि ऐसे व्यक्ति को समर्थन न दें, जिसने बस्तर की जनता को नक्सलियों के रहमोकरम पर छोड़ दिया था।”
इस पत्र के सामने आने के बाद चुनावी राजनीति में बस्तर और सलवा जुडूम का मुद्दा फिर से गहराता नजर आ रहा है। कांग्रेस जहां बी सुदर्शन रेड्डी को “न्यायप्रिय और संवैधानिक सोच वाला” बताकर उनके समर्थन की अपील कर रही है, वहीं सत्ता पक्ष इसे नक्सलवाद समर्थक मानसिकता करार दे रहा है।

