छत्तीसगढ़ को “धान का कटोरा” कहा जाता है, लेकिन कृषि अर्थशास्त्री मानते हैं कि राज्य में धान की प्रधानता ही गरीबी का बड़ा कारण भी है। खुद प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी अक्सर कहा करते थे — “छत्तीसगढ़ में धान और गरीबी, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।”
मध्यप्रदेश काल में कृषि पैटर्न बदलने की दिशा में कोई गंभीर प्रयास नहीं हुए। राज्य गठन के बाद अजीत जोगी सरकार ने फसल चक्र परिवर्तन (Crop Diversification) की पहल शुरू की थी — मक्का, मिलेट और दलहन-तिलहन की ओर किसानों को बढ़ाने का प्रयास हुआ, पर सरकार बदलते ही यह पहल ठंडी पड़ गई। बीते दो दशकों में यह विषय फिर कभी नीति के केंद्र में नहीं आया।

तथ्य साफ हैं — धान कमाता कम है।
एकड़ भर धान में औसतन 20 हजार रुपए से ज्यादा बचत नहीं होती। जबकि मिलेट, मक्का या दलहनी फसलें लगाने पर यही प्रति एकड़ 40 से 50 हजार तक आमदनी हो सकती है। इसका उदाहरण राजनांदगांव के छुरिया और कांकेर के पखांजूर इलाके में देखा जा सकता है, जहां बड़ी संख्या में किसान अब पूरी तरह मक्का की ओर शिफ्ट हो चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मॉडल बाकी जिलों में भी लागू किया जा सकता है।
सरकार द्वारा धान खरीदी अब 3100 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुँच चुकी है, फिर भी छोटे किसानों की स्थिति में बड़ा बदलाव नहीं आया। इसकी वजह यह है कि प्रदेश में 85-90% किसान छोटे और सीमांत वर्ग के हैं, जिनकी जोत 2 से 4 एकड़ के बीच है। किसी भी बड़े खर्च के समय उन्हें आज भी कर्ज का सहारा लेना पड़ता है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक छत्तीसगढ़ में धान पर निर्भरता नहीं टूटी और फसल चक्र लागू नहीं हुआ, तब तक खेती से गरीबी का चक्र नहीं टूटेगा — चाहे न्यूनतम समर्थन मूल्य कितना ही बढ़ा क्यों न दिया जाए।

