रायपुर। समाज की बुनियाद सिर्फ़ घरों की कतारों से नहीं, बल्कि उन घरों में रहने वाले लोगों के दिलों की रोशनी से मजबूत होती है। आज के दौर में जहाँ निजी जीवन और स्वार्थ ने इंसान को अपने खोल में कैद कर दिया है, वहीं इस्लाम पड़ोसी अधिकारों को इतनी अहमियत देता है कि पैग़म्बर मुहम्मद (सल.) ने पड़ोसी के साथ अच्छे व्यवहार को ईमान का हिस्सा करार दिया है।
पवित्र हदीसों में बार-बार पड़ोसी की इज़्ज़त, मदद और खैरख्वाही की हिदायत दी गई है। यही वजह है कि आदर्श मुस्लिम समाज की पहचान ही आदर्श पड़ोस के तौर पर सामने आती है।
इस्लाम में पड़ोसी का मुकाम
तीन मशहूर हदीसें इस जिम्मेदारी को साफ तौर पर बयान करती हैं—
“अपने पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करो, तुम्हें ईमान का मर्तबा मिल जाएगा।” (तिर्मिज़ी)
“वह जन्नत में दाख़िल नहीं होगा जिसका पड़ोसी उसकी तकलीफ़ से महफूज़ न हो।” (मुस्लिम)
“वह मोमिन नहीं जिसका पेट भरा हो और उसका पड़ोसी भूखा हो।” (बुखारी)
जिब्रील (अलै.) की लगातार नसीहतों के चलते पैग़म्बर मुहम्मद (सल.) ने पड़ोसी के अधिकारों को इतनी अहमियत दी कि सहाबी भी हैरान थे कि कहीं पड़ोसी को विरासत में शामिल न कर दिया जाए।
अच्छा पड़ोसी कैसा होता है?
मददगार
रहनुमा और रखवाला
तकलीफ़ न देने वाला
सब्र करने वाला
भलाई का ख्याल रखने वाला
अच्छा पड़ोस कैसा होता है?
आपसी सहयोग से भरा
साफ-सुथरा
विवादों का शांतिपूर्ण समाधान
माहौल में अपनापन और भरोसा
दूसरे धर्म के पड़ोसी: इस्लाम का मानवीय सन्देश
इस्लाम सिर्फ मुसलमानों के पड़ोसियों की बात नहीं करता। गैर-मुस्लिम पड़ोसियों के साथ भी:
अपनापन बढ़ाना
उपहार देना
दुख-सुख में साथ खड़ा होना
उनके हितों की हिफ़ाज़त करना
ये सब इस्लामी तालीमात का हिस्सा हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस्लाम के खिलाफ फैलाए जाने वाले हर प्रोपगंडे का सबसे बेहतरीन जवाब एक अच्छा मुसलमान पड़ोसी है।
अपना घर—अपना पड़ोस: एक जैसा नजरिया
धर्म गुरुओं का कहना है कि जिस तरह इंसान अपने घर में मोहब्बत, सफ़ाई, शांति और तालीम पसंद करता है, वही व्यवहार पड़ोस में भी लागू होता है।
मसलन—
अपने घर में शोर पसंद नहीं? पड़ोस में भी न करें।
अपने घर में गाली-गलौज पसंद नहीं? पड़ोस में भी उससे बचें।
अपने बच्चों की तालीम चाहते हैं? पड़ोस के बच्चों के लिए भी वही सोच रखें।
मौजूदा हालात: समस्याएँ और सीख
आज प्राइवेसी के नाम पर लोग एक-दूसरे से दूर हो गए हैं। दरवाज़े बंद हैं, दिलों के रास्ते तंग हो गए हैं। ऐसे माहौल में इस्लाम की पड़ोसी-अनुकूल शिक्षाएँ समाज को फिर से जोड़ने की सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभरती हैं।
नतीजा
धार्मिक विद्वान मानते हैं कि यदि इस्लामी पड़ोसी-अख़लाक को अपनाया जाए, तो मोहल्ले आदर्श पड़ोस बनेंगे और आदर्श पड़ोस मिलकर आदर्श समाज की नींव रखेंगे—एक ऐसा समाज जहाँ मोहब्बत, अमन और इंसानियत की रोशनी हर घर में फैली हो।

