वरिष्ठता को नजरअंदाज कर जूनियर को प्रमोशन देना पड़ा भारी, हाई कोर्ट ने शिक्षा विभाग का आदेश किया निरस्त

वरिष्ठता को नजरअंदाज कर जूनियर को प्रमोशन देना पड़ा भारी, हाई कोर्ट ने शिक्षा विभाग का आदेश किया निरस्त

– वरिष्ठता को दरकिनार कर जूनियर शिक्षक को पदोन्नति देने के मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के आदेश को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि सेवा नियमों की अवहेलना कर किसी पात्र कर्मचारी को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह आदेश बिलासपुर हाई कोर्ट के सिंगल बेंच न्यायमूर्ति संजय जायसवाल ने शिक्षक दिनेश कुमार राठौर की याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया।

– क्या है पूरा मामला
याचिकाकर्ता दिनेश कुमार राठौर की प्रारंभिक नियुक्ति 26 अप्रैल 1989 को निम्न वर्ग शिक्षक के पद पर हुई थी। इसके बाद 2 फरवरी 2009 को उन्हें उच्च वर्ग शिक्षक के पद पर पदोन्नति मिली। 23 जनवरी 2015 को जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) द्वारा आदेश जारी कर उन्हें 18 अगस्त 2008 से वरिष्ठता प्रदान की गई थी।
याचिका के अनुसार, नियमों के तहत आवश्यक 5 वर्ष की सेवा पूर्ण करने के बाद याचिकाकर्ता व्याख्याता (लेक्चरर) पद पर पदोन्नति के लिए पात्र था। छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा राजपत्रित सेवा (स्कूल स्तर सेवा) भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2008 के अनुसार व्याख्याता का पद 100 प्रतिशत पदोन्नति के माध्यम से उच्च वर्ग शिक्षकों से भरा जाना है।
विभाग पर मनमानी का आरोप
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि इसके बावजूद 19 जून 2012 को जारी विभागीय पदोन्नति आदेश में उससे कनिष्ठ शिक्षकों को प्रमोशन दे दिया गया, जबकि उसके मामले पर विचार ही नहीं किया गया। विभाग ने यह कहकर दावा खारिज कर दिया कि 1 अप्रैल 2010 की स्थिति में उसके पास स्नातकोत्तर डिग्री नहीं थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने 16 अप्रैल 2012 को स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर ली थी, इसके बावजूद जानबूझकर उसके नाम पर पदोन्नति के लिए विचार नहीं किया गया।
हाई कोर्ट का फैसला
मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने 16 सितंबर 2016 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें स्नातकोत्तर डिग्री नहीं होने के आधार पर याचिकाकर्ता को पदोन्नति के लिए अपात्र ठहराया गया था।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह अपनी सभी मांगों के साथ विभाग के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करे। साथ ही सक्षम प्राधिकारी को आदेश दिया गया है कि भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2008 के अनुसार 90 दिनों (तीन महीने) के भीतर मामले में निर्णय लिया जाए।
अहम टिप्पणी
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि
“सेवा नियमों की अनदेखी कर किसी पात्र कर्मचारी को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।”
यह फैसला शिक्षा विभाग में पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर एक अहम नजीर माना जा रहा है।

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