HC: सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के खिलाफ विदेशी नागरिक नहीं जा सकते कोर्ट

HC: सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे के खिलाफ विदेशी नागरिक नहीं जा सकते कोर्ट

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक फैसले में स्पष्ट किया है कि विदेशी नागरिक सरकारी जमीन पर किए गए किसी भी अनधिकृत कब्जे की रक्षा के लिए संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय के रिट अधिकार क्षेत्र का लाभ नहीं उठा सकते. अदालत ने पुनः दोहराया कि भारत में विदेशी नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकार केवल संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) तक ही सीमित हैं.

न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने बांग्लादेश से आए शरणार्थियों द्वारा दायर याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया. याचिकाकर्ताओं का दावा था कि उनके पूर्वजों को वर्ष 1964 में सरकार द्वारा सूरजपुर जिले के मदनपुर गांव में बसाया गया था और वे पिछले छह दशकों से उस भूमि पर काबिज होकर कृषि व निवास कर रहे हैं.

उन्होंने उक्त जमीन को महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय को उद्यानिकी महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र की स्थापना के लिए आवंटित किए जाने तथा प्रशासन द्वारा शुरू की गई बेदखली की कार्रवाई को चुनौती दी थी.

राज्य सरकार ने याचिकाओं का विरोध करते हुए तर्क दिया कि प्रश्नगत भूमि पूर्णतः शासकीय है और याचिकाकर्ता इस पर अपना कोई वैध मालिकाना हक या कानूनी अधिकार साबित करने में विफल रहे हैं. सरकार ने स्पष्ट किया कि जमीन का आवंटन नियमानुसार और जनहित के उद्देश्य से किया गया है.

उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के ‘सर्बानंद सोनोवाल बनाम भारत संघ (2005)’ के चर्चित फैसले का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि जो व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है और न ही भूमि पर अपना कोई कानूनी अधिकार स्थापित कर सकता है, वह असाधारण रिट अधिकार क्षेत्र का आह्वान नहीं कर सकता.

अदालत ने कहा कि सरकार का यह कर्तव्य है कि वह शासकीय भूमि को अवैध कब्जे से सुरक्षित रखे. यह जमीन छात्रों, किसान समुदाय और आम जनता के व्यापक हित में विश्वविद्यालय को आवंटित की गई है.

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ताओं की कानूनी स्थिति और कब्जे के स्रोत से जुड़े गंभीर विवादित तथ्यों का निपटारा रिट अधिकार क्षेत्र के तहत नहीं किया जा सकता. बिना किसी वैध दस्तावेज या कानूनी अधिकार के केवल लंबे समय से कब्जा होना किसी को कोई निहित अधिकार प्रदान नहीं करता. इन आधारों पर हाईकोर्ट ने सभी याचिकाओं को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया.

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