फ़िजी में एचआईवी संक्रमण के तेजी से बढ़ते मामलों ने वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में देश में राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया गया है, क्योंकि अब वहां लगभग हर 60 वयस्कों में से एक व्यक्ति एचआईवी के साथ जीवन जी रहा है। पांच वर्ष पहले यह अनुपात 167 वयस्कों में एक का था। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूएनएड्स के अनुसार दुनिया भर में करीब 4.1 करोड़ लोग एचआईवी से संक्रमित हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार इस संकट को और गंभीर बनाने वाली एक खतरनाक प्रवृत्ति “ब्लूटूथिंग” है। इसमें किसी ऐसे व्यक्ति का खून निकालकर दूसरे व्यक्ति को इंजेक्ट किया जाता है जिसने पहले से नशीले पदार्थ का सेवन किया हो, ताकि दूसरा व्यक्ति भी उसी नशे का प्रभाव महसूस कर सके। इस प्रक्रिया में एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी और अन्य गंभीर संक्रमणों के फैलने का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है।
ड्रग फ्री फ़िजी की कार्यकारी निदेशक कालेसी वोलाताबु का कहना है कि गरीबी और नशीले पदार्थों की लत इस प्रथा को बढ़ावा दे रही है। उनके अनुसार एक संक्रमित व्यक्ति से कुछ ही समय में कई अन्य लोग संक्रमण की चपेट में आ सकते हैं। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि फ़िजी में “ब्लूटूथिंग” के व्यापक स्तर पर होने के सीमित प्रमाण मिले हैं, फिर भी इसे संभावित जोखिम माना जा रहा है।
एचआईवी एक ऐसा वायरस है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देता है और इलाज न मिलने पर एड्स जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है। हालांकि एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) की मदद से संक्रमित व्यक्ति लंबा और सामान्य जीवन जी सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित सुई, जागरूकता अभियान और समय पर जांच व उपचार ही एचआईवी के बढ़ते खतरे को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय हैं।

