
राजधानी के तेलीबांधा थाना क्षेत्र में मंगलवार देर शाम हुई चाकूबाजी की घटना अब सिर्फ आपराधिक मामला नहीं रह गई है, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
पुरानी रंजिश के चलते काशीराम नगर में बोरियाखुर्द निवासी अरशद पर बलजीत, बॉबी, लक्की चंद्राकर और उनके साथियों ने मिलकर चाकू से हमला कर दिया। हमले में अरशद गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसे तत्काल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसका इलाज जारी है।
पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपियों की तलाश शुरू करने की बात कही है, लेकिन इस बीच एक चौंकाने वाला पहलू सामने आया है।
घायल ही बना ‘संदिग्ध’
जानकारी के मुताबिक, हमले में घायल अरशद को ही पुलिस ने रात भर थाने में बैठाकर रखा।
पुलिस का तर्क है कि वर्ष 2018 के एक पुराने मारपीट मामले में उसके खिलाफ वारंट लंबित है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि एक गंभीर रूप से घायल व्यक्ति, जो खुद हमले का शिकार हुआ है—क्या उसे इस हालत में थाने में बैठाकर रखना उचित है?
पुलिस पर पक्षपात के आरोप
मामले में यह भी चर्चा है कि आरोपियों में से एक का आपराधिक इतिहास रहा है और वह कथित रूप से गांजा तस्करी के मामले में जेल जा चुका है।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि पुलिस एक आरोपी को बचाने की कोशिश कर रही है, क्योंकि वह एक मृत पुलिसकर्मी का पुत्र बताया जा रहा है।
इलाके में तनाव, लोगों में आक्रोश
घटना के बाद इलाके में कुछ समय के लिए अफरा-तफरी का माहौल रहा। स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि पीड़ित को ही प्रताड़ित किया जा रहा है, जबकि आरोपी अब तक फरार हैं।
पुलिस का पक्ष
थाना प्रभारी अजय झा ने कहा कि मामला पुरानी रंजिश का है, FIR दर्ज कर ली गई है और आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए टीम गठित कर दी गई है।
सबसे बड़ा सवाल
क्या कानून व्यवस्था में पीड़ित को ही संदेह के घेरे में रखना न्यायसंगत है?
क्या वाकई पुलिस निष्पक्ष कार्रवाई कर रही है या दबाव में काम कर रही है?
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर पुलिस की निष्पक्षता और संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अब देखना होगा कि आरोपियों पर कब तक कार्रवाई होती है—या यह मामला भी आरोप-प्रत्यारोप में दबकर रह जाएगा।

