छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों पितृ पक्ष और नवरात्रि के बीच एक अलग तरह का अनुष्ठान चल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि पूजा-पाठ मंदिरों में कम और सत्ता के गलियारों में ज्यादा दिखाई दे रहा है। भाजपा हाईकमान ने 24 घंटे के भीतर संगठन महामंत्री, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री और प्रदेश प्रभारी जैसे अहम पदों पर बदलाव कर यह संकेत दे दिया है कि दिल्ली अब छत्तीसगढ़ को लेकर पूरी तरह “एक्शन मोड” में है।
यही वजह है कि सत्ता के गलियारों में सबसे ज्यादा बेचैनी मंत्रिमंडल को लेकर दिखाई दे रही है। जिन मंत्रियों के विभागों की कार्यशैली, जनसंपर्क और राजनीतिक प्रभाव को लेकर लंबे समय से सवाल उठ रहे हैं, वे अब हर बदलाव को अपने भविष्य से जोड़कर देख रहे हैं। राजनीतिक चर्चाओं में यह बात खुलकर कही जा रही है कि संगठन में हुए बड़े फेरबदल के बाद सरकार का नंबर भी आ सकता है।
स्मृति ईरानी की प्रदेश प्रभारी के रूप में एंट्री को भी सामान्य राजनीतिक नियुक्ति नहीं माना जा रहा। उनकी पहचान एक आक्रामक और परिणाम आधारित नेता की रही है। ऐसे में संगठन और सरकार दोनों के प्रदर्शन की समीक्षा पहले से ज्यादा कठोर होने की संभावना जताई जा रही है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व लगातार यह संदेश देता रहा है कि चुनावी जीत स्थायी गारंटी नहीं है, प्रदर्शन ही असली पैमाना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मंत्रिमंडल में बदलाव होता है तो वह केवल प्रतीकात्मक नहीं होगा। कई नए चेहरों को मौका देने और कुछ अनुभवी नेताओं की वापसी की चर्चाएं भी तेज हैं। पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल, अजय चंद्राकर और राजेश मूणत जैसे नाम फिर से राजनीतिक गलियारों में तैरने लगे हैं। हालांकि, अंतिम फैसला पूरी तरह केंद्रीय नेतृत्व के राजनीतिक आकलन पर निर्भर करेगा।
एक और चर्चा सत्ता के गलियारों में गर्म है—क्या भाजपा राज्यों में “सिंगल पावर सेंटर” की रणनीति की ओर बढ़ रही है? यदि व्यापक पुनर्गठन हुआ तो डिप्टी सीएम व्यवस्था पर भी सवाल उठ सकते हैं। वहीं यदि सीमित फेरबदल हुआ तो मौजूदा ढांचा बरकरार रह सकता है। फिलहाल यह सिर्फ राजनीतिक अटकलों का विषय है, लेकिन चर्चाओं का बाजार गर्म है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि अभी तक किसी आधिकारिक संकेत के बिना ही सत्ता पक्ष के भीतर असहजता महसूस की जा रही है। आमतौर पर जब संगठन में इतने कम समय में बड़े बदलाव होते हैं तो राजनीतिक संदेश केवल संगठन तक सीमित नहीं रहता। छत्तीसगढ़ में भी यही संदेश पढ़ा जा रहा है कि अब रिपोर्ट कार्ड का दौर शुरू हो चुका है।
कुल मिलाकर, इस बार दिवाली सिर्फ रोशनी का त्योहार नहीं बल्कि राजनीतिक भविष्य की परीक्षा भी बन सकती है। मंत्रिमंडल में बदलाव होगा या नहीं, कितने चेहरे बदलेंगे और कौन लौटेगा—इन सवालों का जवाब आने वाले हफ्तों में मिलेगा। लेकिन इतना तय है कि छत्तीसगढ़ भाजपा में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा किसी उत्सव की नहीं, बल्कि संभावित “पॉलिटिकल रीसैट” की है।

