आडवाणी अस्पताल में भर्ती, BJP के भीतर वरिष्ठों की पूछ-परख पर भी उठे सवाल!

आडवाणी अस्पताल में भर्ती, BJP के भीतर वरिष्ठों की पूछ-परख पर भी उठे सवाल!

98 वर्षीय लालकृष्ण आडवाणी को चेस्ट इंफेक्शन, अपोलो अस्पताल में डॉक्टरों की निगरानी में; कभी पार्टी की राजनीति के केंद्र में रहने वाले दिग्गज नेता अब कितने सक्रिय?

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को सीने में संक्रमण की शिकायत के बाद शुक्रवार शाम नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया। 98 वर्षीय आडवाणी की हालत फिलहाल स्थिर बताई गई है। चिकित्सकों की विशेष टीम उनकी निगरानी कर रही है और जरूरी जांच की जा रही है।

आडवाणी को शाम करीब 7:30 बजे अस्पताल लाया गया। शुरुआती जांच के बाद उन्हें पल्मोनोलॉजी विभाग में भर्ती किया गया। बढ़ती उम्र को देखते हुए डॉक्टर उनकी सेहत पर नजर रखे हुए हैं।

बीमारी की खबर के बीच सियासी सवाल भी

लालकृष्ण आडवाणी के अस्पताल में भर्ती होने की खबर ने उनकी सेहत को लेकर चिंता बढ़ा दी है। लेकिन इसके साथ ही भारतीय राजनीति में एक असहज सवाल भी चर्चा के योग्य है—जिस नेता ने भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करने के लिए दशकों तक संघर्ष किया, क्या आज उसी पार्टी में उनकी सक्रियता और राजनीतिक पूछ-परख पहले जैसी रह गई है?

यह सच है कि उम्र के इस पड़ाव पर सक्रिय राजनीति से दूरी स्वाभाविक हो सकती है। लेकिन किसी राजनीतिक दल का इतिहास केवल उसके वर्तमान नेतृत्व से नहीं बनता। उस इतिहास को गढ़ने वाले वरिष्ठ नेताओं के योगदान, सम्मान और विरासत को याद रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

हालांकि, आडवाणी की अनदेखी किए जाने का निष्कर्ष निकालने के लिए ठोस तथ्यों और हालिया घटनाक्रम की जरूरत है। पार्टी के भीतर वरिष्ठ नेताओं की भूमिका और उनके साथ होने वाले व्यवहार पर सवाल उठाना अलग बात है, जबकि किसी निष्कर्ष पर पहुंचना अलग।

कभी भाजपा की राजनीति के प्रमुख रणनीतिकार थे आडवाणी

लालकृष्ण आडवाणी भाजपा के सह-संस्थापकों और पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्षों में शामिल रहे हैं। उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक विस्तार और उसे राष्ट्रीय राजनीतिक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1998 से 2004 तक उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री और 2002 से 2004 तक तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में उपप्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया।

उनके राजनीतिक जीवन में राम जन्मभूमि आंदोलन और देशव्यापी रथयात्रा की भी अहम भूमिका रही, जिसने भारतीय राजनीति की दिशा और भाजपा के जनाधार को प्रभावित किया। उनके सार्वजनिक जीवन में योगदान के लिए वर्ष 2024 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

सवाल सिर्फ एक नेता की सेहत का नहीं, राजनीतिक विरासत का भी है

आडवाणी के अस्पताल में भर्ती होने पर उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की जा रही है। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण उनकी सेहत है। लेकिन इस घटनाक्रम के बहाने एक व्यापक सवाल भी सामने आता है—क्या भारतीय राजनीति में वरिष्ठ नेताओं का महत्व समय के साथ केवल औपचारिक सम्मान तक सीमित हो जाता है?

जिस नेता ने पार्टी के लिए अपना लंबा राजनीतिक जीवन समर्पित किया, उसकी विरासत को केवल पुरस्कारों और सम्मान समारोहों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। राजनीतिक दलों की पहचान उनके वर्तमान नेतृत्व के साथ-साथ उन लोगों के योगदान से भी बनती है, जिन्होंने संगठन की नींव रखी और उसे आगे बढ़ाया।

अब निगाहें आडवाणी की सेहत पर हैं।उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना के साथ यह चर्चा भी जरूरी है कि राजनीतिक विरासत का सम्मान केवल मंचों और संबोधनों में नहीं, बल्कि व्यवहार और संगठनात्मक संस्कृति में भी दिखाई देना चाहिए। ये सवाल किसीको ठेस पहुचने के लिए नही है.

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