साहित्य और कलाओं के लिए कभी कोई स्वर्ण युग न था, न हो सकता है
साहित्य और कलाओं को पढ़, समझ और उनसे सीखकर सच्चा लोकतांत्रिक बना जा सकता है. ये संसाधन हमारे पड़ोस में हैं, अगर हम अपनी खिड़की खोलकर देखें हमारे आस-पास इतना गर्हित विभिन्न रूपों में प्रतिदिन…









